Thursday, November 8, 2018

भैया दूज क्यों मनाया जाता हैं ? भैया दूज कैसे मनाई जाती हैं? भैया दूज की पौराणिक कथा हिंदी में । about bhai dooj in hindi

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भैया दूज क्यों मनाते हैं ?

 भाई दूज या भैया दूज   भाई बहन का त्यौहार है ।   इस त्यौहार को बहन अपने भाई की दीर्घायु के लिए मनाती है। वैसे  हिंदुओं में भाई बहन के लिए दो त्योहार मनाया जाता है जिसमें से एक त्योहार रक्षाबंधन होती है तो दूसरा भैया दूज कहलाती है ।  रक्षाबंधन के त्यौहार में बहन अपने भाई के कलाई में राखी बांध कर भाई की रक्षा एवं दीर्घायु की कामना करती है जबकि भैया दूज में अपने भाई के लिए उपवास रखकर इसे मनाती है ।

भैया दूज का त्यौहार कब मनाया जाता है ? 

 भैया दूज का त्यौहार दीपावली के 2 दिन बाद  मनाई जाती है ।  भैया दूज कार्तिक मास के द्वितीय को मनाया जाता है ।  तो इस तरह से देखा जाए तो यह पूजा दीपावली के बाद सबसे पहला त्यौहार होती है ।  यह त्योहार पूरे भारत में  मनाई जाती है ।

 भैया दूज कैसे मनाया जाता है ?  भैया दूज कैसे मनाते हैं ?  भैया दूज मनाने  का पौराणिक  विधि क्या है ? 

 दीपावली के 2 दिन बाद यानी  कार्तिक मास के द्वितीय को बहने  अपने भाई के दीर्घायु के लिए पूजा अर्चना करती है ।  और अपने भाई को तिलक लगाती है ।   पूजा करने के बाद अपने भाई को उसके शरीर पर तेल मल कर गंगा या यमुना में स्नान करवाया जाता है ।  यदि गंगा या यमुना मैं स्नान करवाना संभव ना हो तो घर पर ही स्नान करवाया जा सकता है । भैया दूज के दिन भाई को अपनी बहन कि घर का भोजन करना विशेष शुभ माना जाता है ।  जिस व्यक्ति का अपनी बहन ना हो तो उसे भी अपनी चचेरी फुफेरी मौसेरी बहन के घर की खाना खा लेनी चाहिए ।  अगर फिर भी कोई बहन ना हो तो उस व्यक्ति को कार्तिक मास के द्वितीय को यानी भैया दूज के दिन उसे गाय के समीप रहकर भोजन अवश्य कर लेनी चाहिए ।  इसे अति शुभ माना जाता है ।

 भैया दूज के दिन गोधन  कुटी  जाती है या नहीं ? 

 भैया दूज के दिन गोधन कूटने  की प्रथा वर्षों से चली आ रही है ।  इस दिन सभी  बहनें   गोबर की मानव मूर्ति बनाकर छाती पर ईट रखकर स्त्रियां उसे मूसलों   से  तोड़ती है ।

 और महिलाएं भूत प्रेत वाली कहानियां सुनाती है ।  गोधन कूटते समय  महिलाएं अपनी जीभ को बेल की काँटे  से  दागती  है ।  यह सब कुछ दोपहर तक करने के बाद भाई बहन इस त्यौहार को काफी खुशी के साथ मनाते हैं ।  इस पूजा में यमराज एवं यमुना की पूजा का विशेष महत्व दिया ।  जाता है ।


 भैया दूज की पौराणिक कथा -

 भगवान श्री  सूर्य नारायण की पत्नी का नाम छाया था।  उनकी कोख से यमराज और यमुना का जन्म हुआ था ।  यमुना यमराज से बहुत प्यार करती थी ।  यमुना हमेशा यमराज को कहती थी तुम अपने दोस्तों के साथ मेरे घर आकर खाना खाया करो ।  लेकिन  यमराज को काफी व्यस्त होने के कारण  यमुना का घर नहीं जा पाता था  और हमेशा बात को इसी तरह से टालता रहता था ।  एक दिन कार्तिक शुक्ल का दिन आया  यमुना ने  अपने भाई को भोजन करने के लिए अपने घर आने को बचनवध किया ।।

 यमराज को बड़ा विचित्र लग रहा था वह सोच रहा था मैं लेबू का प्राण हरने वाला हूं और इसीलिए लोग मुझे अपने घर नहीं बुलाते हैं लेकिन बहन इतनी सद्भावना से बुला दिए तो उसके घर जाना  मेरा धर्म होगा ।
 अपनी बहन के घर आते समय यमराज ने नरक में निवास करने वाले प्राणियों को मुक्त कर दिया ।  यमराज को अपने घर आए हुए देख कर उसकी बहन यमुना को बहुत खुशी हुई ।  उसने पूजा अर्चना करके और अपने भाई को  स्नान कराकर के भोजन परोसा ।  बहन द्वारा किए गए  सत्कार से यमराज काफी खुश हुआ  और उसमें अपनी बहन को एक बार मांगने को बोला ।
    यमुना में बहुत नम्रता से बोली,  भाई !  आप इसी दिन हर साल मेरे घर आया करो और मेरी तरह जो बहन ने अपने भाई को टीका करके आदर सत्कार के साथ भोजन कराएं तो उन सभी भाइयों  का आपका  भय ना हो ।
     यमराज ने तथास्तु  कहकर यमुना को वस्त्र आभूषण देकर यमलोक लौट गया ।
 उसी दिन से इस पर्व की मनाने का परंपरा शुरू हुई।  ऐसा माना जाता है कि जो बहन अपने भाई को कार्तिक मास द्वितीय को टीका लगाकर आदर सत्कार करता है उसका यमराज कब है खत्म हो जाती है ।  यही कारण है कि भैया दूज के दिन यमराज और यमुना का भी पूजा किया जाता है ।

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